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मंत्र योग

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मंत्र योग का यह सिद्धांत है । की परमात्मा से भाव , भाव के नाम रूप और उसका विकार तथा विलासमय यह संसार है , इसलिए जिस क्रम से स्राष्टि हुई है उसके विपरीत मार्ग से ही लय होगा । ये निश्चित है । जब परमात्मा से भाव और भाव से नाम रूप दुवारा स्राष्टि हुई है । जिससे समस्त जीव बंधन में आ गये है । तब यदि मुक्ति लाभ करना हो तो प्रथम नाम रूप का सहारा लेकर , नाम रूप से भाव में और भाव से भावरूपी परमात्मा में चित्तव्रती के लय होने से मुक्ति होगी । नारद आदि महाऋषि ने इसलिए नाम रूप की साधना की जो विधियाँ बताई है । इसी का नाम मंत्र योग हैं । मंत्र योग में ध्यान और भक्ति योग भी आते हैं । इसमें प्राणायाम को छोड़ कर सात अंग है । चक्रों में मूलाधार , मणिपुर व आज्ञा सहित तीन चक्र हैं ।
हिन्दु जाति की मूर्ति पुजा और पीठ विज्ञान मंत्र योग के अनुसार ही सिद्ध होते हैं ।  मंत्र योग के ग्रन्थों के अनुसार उसके मुख्य रूप बतलाये जाते हैं । चंद्रमा की तरहा मंत्र योग भी सोलह कलाओं से पूर्ण हैं ।

   1.      भक्ति
   2.      शुद्धि
   3.      आसन
   4.      पंचांग सेवन
   5.      आचार
  6.      धारणा
  7.      दिव्यदेश सेवन 
  8.      प्राण क्रिया
  9.      मुद्रा
  10.  तर्पण
  11.  हवन
  12.  बलि
  13.  यज्ञ 
  14.  जप
  15.  ध्यान
  16.  समाधि

मंत्र योग में शुद्धि एक आवश्यक अंग है । शुद्धि  दो प्रकार की होती है ।
 1.  बाहय शुद्धि
 2.  अन्तर शुद्धि

बाहय शुद्धि तीन प्रकार की होती है ।
  1.  शरीर शुद्धि    2. स्थान शुद्धि     3. दिशा शुद्धि  ।  
  
शरीर शुद्धि भी सात प्रकार की होती हैं ।
  1-      मंत्र स्नान 
  2-      भौम स्नान
  3-      आग्नेय स्नान
  4-      मागव्य स्नान
  5-      दिव्य स्नान
  6-      वरुण्य स्नान
  7-      मानस स्नान

शुद्धि का फल :-बाहर की शुद्धि से आरोग्यता , आत्मप्रसाद  व इष्टदेव की कृपा तथा मन की शुद्धि से इष्टदेव का दर्शन और समाधि प्राप्त होती है ।
  स्वप्न विज्ञान

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वैशेषिक दर्शन में स्मृति – ज्ञान को पूर्व संस्कारों से जन्य माना गया है । स्वप्न भी पूर्व संस्कारों से ही होता । आपने आपने विषयों के ग्रहण के उपरांत इंद्रियों से मन जिन जिन विषयों का प्रत्यक्ष अनुभव करता हैं । वही स्वप्न कहलाता है ।

वात , पित्त , और कफ की विषमता से भी स्वप्न होते हैं ।

वात दोष से – आकाश , गगन , प्रथ्वी पर्यटन , भयानक सिंह , व्याघ्र आदि स्वप्न दिखाई देते है । 

पित्त दोष से --- अग्नि प्रवेश , अग्नि ज्वाला , कनक पर्वत ,बिजली आदि देखे जाते हैं ।

कफ दोष से – समुद्र में तैरना , नदी में नहाना , पानी की वर्षा , रजत पर्वतारोहण आदि ।

वेदान्त दर्शन में भी स्वप्न फलादेश के विषय में कहा गया हैं :-

श्रुति स्वप्न के फल को बताती है । जब कोई विशेषा कर्म करते हों और स्वप्न में स्त्री दर्शन होतो उससे अपने कर्म की सफलता माना चईए ।

ज्योतिष शास्त्र के  विद्वान कल्पद्रुम ग्रंथ में स्वप्न सात प्रकार के बताते हैं।

 द्रष्ट , 2. श्रुति  , 3. अनुभूत , 4. प्रार्थित , 5. कल्पित , 6. भाविक , 7. दोषज ।   
1.       जाग्रत अवस्था में देखी हुई वस्तुओं का स्वप्न देखना द्रष्ट कहलाता है ।
2.       प्राचीन या नवीन सुनी हुई बातों को देखना श्रुति कहा जाता है ।
3.       जाग्रत अवस्था में परीक्षित वस्तुओं का देखना अनुभूत स्वप्न होता हैं ।
4.       जाग्रत अवस्था में इच्छा की हुई वस्तुओं का देखना प्रार्थित स्वप्न होता हैं ।
5.       कल्पना की हुई वस्तुओं का देखना कल्पित स्वप्न है ।
6.       देखी सुनी हुई बातों से विलक्षण मंत्राभ्यासादी से जो स्वप्न दिखाई देते है , उन्हें भाविक कहते है ।
7.       वात , कफ , पित्त दोष से जो स्वप्न होते हैं उनको दोषज कहते है ।

शुरू के पांचों स्वप्न ज़्यादातर झूठ होते हैं । अंतिम दोनों प्रकार के स्वप्न सत्य होते हैं ।

आयुर्वेद में स्वप्नविचार  --- वात ,कफ , पित्त दोषो से भिन्न – भिन्न प्रकार के संस्कारों के उदय से स्वप्न देखे जाते हैं । जिन्हें सुश्रुति संहिता के सूत्र के उन्नतिसवें अध्याय में इस प्रकार बताया गया है  है । जो कोई रोगी अपने भाई बंधुओं को रोगी देखता है । - तेल से पुते हुये अपने शरीर को देखता है । ऊँट , सर्प , गधा , सूअर , और भैस से घिरा हुआ दक्षिण दिशा में जाता हुआ देखता है । आदि आदि देखता है । तो रोगी होता हैं ।

लाल रंग का स्वप्न किसी भी प्रकार का हो वह अशुभ ही होता है । केवल लाल कच्चा मांस तथा लाल चन्दन को देखना शुभ होता है । सफ़ेद वर्ण के सभी स्वप्न शुभ होते हैं । तथा कपास , भस्म तथा दही का देखना अशुभ है । काले वर्ण के स्वप्न भी अशुभ है । केवल भूमि , सोना , काला ब्राह्मण , काला देवता और हाथी देखना शुभ है । चरक संहिता के इन्द्रिय स्थान में शुभाशुभ स्वप्नों की गणना सुश्रुत की गणना से मिलती जुलती है ।

वैदिक ग्रंथो में भी स्वप्न के विषय में बहुत विचार किया गया है । अथर्ववेद के 16 , 17 ,18 काण्डों में अनेक सूक्तों में स्पष्ट रूप से स्वप्न का अनिष्टकारी प्रभाव बताकर उससे रक्षा के उपाये बतायें हैं । इनमें कई एक के पाठ ऋग्वेद में भी आये है । अर्ववेद के 16 वें काण्ड के 5 पयार्य सूक्त इस विषय को स्पष्ट करता है 

जब कोई साधक दीक्षा ग्रहण या प्रयोगनुष्टान किसी कार्य सिद्धि के लिये करता है तब उसकी सिद्धि असिद्धि  का ज्ञान स्वप्न मंत्रों के अभ्यास द्वारा कराना तंत्र ग्रन्थों में बताया गया है । उस समय में जिन जिन स्वप्नों का स्वरूप एवं फल जैसा बताया होता है । उसके विचार द्वारा सिद्धि का निर्णय किया जाता है । स्वप्न काल में सिद्ध या देवता के द्वारा प्राप्त मंत्रों को स्वयं सिद्ध माना जाता है । स्वप्नकाल में प्रसादभिमुख देवता का वरदान भी प्राप्त होता है और वह सर्वथा सत्य होता है ।

 शक्ति संगम तंत्र सुन्दरी खण्ड तृतीय पटल में श्री देवीजी ने श्री शिव जी से पूछा की आपने स्वप्न मंत्रों के विषय बताने को पूर्व में कहा था । यदि आप का इस विषय में हमारा अधिकार समझते है तो कृपा कर उसे प्रकट करें । शिवजी ने मंत्रों के अनेक भेद बताने के बाद स्वप्न मंत्रों के भेद और कार्य को इस प्रकार बताया गया है ।

स्वप्न मंत्र तीन चक्रों में विभक्त है । विराट चक्र , तांडव चक्र , और त्रिपुरा चक्र  ।

जिन मंत्रो में नमः पद हो उन्हें विराट चक्र में जानना चाहिए  , अंजन सिद्धि गुटिका ,गुप्ती , आज्ञा सिद्धि को वे प्रदान करते हैं ।  तांडव चक्र के मंत्र  हूं फट  आदि पदों से युक्त होते हैं ।
खड़ग , वेताल सिद्धि , परकाय प्रवेश , चराचर में गति , अणिमादी सिद्धियां उनसे प्राप्त होती है ।
त्रिपुरा चक्र में मंत्र  स्वाहा   पदान्त होते हैं । उनसे सर्व मनोरथ सिद्धि , कलेश का अभाव और पाष्टि सिद्धिश्वर साधक होता हैं । स्वप्न लब्ध मंत्रों में ऋषि छन्द आदि का विनियोग न होने से जप मात्र से ही सिद्धि होती है । या शिव ऋषि गायत्री छन्द चिदरूपिणी देवता ऐसा विनियोग कर लेना चाहिए । कीलक आदि इसमें नहीं होता , स्वप्न मार्ग से सिद्धि होने से इन्हें स्वप्न मंत्र कहते हैं ।।

लिखें में अगर किसी प्रकार की त्रुटि हो गाई हो उसको क्षमा करें तथा आपने विवेक से काम लें । 

 प्राण शक्ति

प्राण शक्ति

            

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जैसे जलाशय में बुलबुले उठते रहते है ,जैसे ज्वालामुखी से चिंगारियाँ निकलती रहती है ,जैसे हिमालय में गंगोत्री के मुख द्वार से जल निरंतर प्रबहित होता रहता है । जैसे सूर्य से किरणें सदा प्रसारित होती रहती है । वैसे ही प्राणशक्ति से निरंतर अनंत प्रकार के संकल्प फुरते रहते है । ये संकल्प ही अपनी – अपनी क्षमता के अनुसार अपना विस्तार कर समाप्त होते रहते है और नवीन नवीन संकल्प उनका स्थान लेते रहते है । यह उनका स्वाभाविक क्रम है । यदपि संकल्प अपनी अपनी क्षमता के अनुसार काम करते रहते है । यानी उत्तपन्न होते है वृद्धि करते है और समाप्त हो जाते है । तथापि प्राणशक्ति आधार रूप से समस्त संकल्पों की प्रत्येक क्रिया के साथ सदैव विद्यमान रहती है । जैसे एक व्यक्ति प्राणशक्ति के आधार पर जीवित रहता है वैसे ही व्यक्ति की जीवन लीला के समाप्त होने पर उसके मृत शरीर को पंचभूतों में मिलने की क्रिया भी प्राण-शक्ति के आधार पर होती है ।

जब प्रत्येक हल में आधार प्राणशक्ति है । तो उसे सर्वत्र समान रूप से व्यापक होना ही चाहिये । उदाहरण एक विशाल पीपल के पेड़ को लीजिये ।  उसकी सब से उपर की एक टहनी के एक पत्ते से पूछा जाये की वह किस के आधार पर स्थिर है तो वह यही कहेगा की जिस टेहनी से मैं जुड़ा हूँ उसके आधार से फिर यदि फिर उस टेहनी से पूछा जाये की तेरा आधार क्या है ? तो वह कहेगी की समीपस्थ डाली से ,फिर उस डाली से पूछा जाये की तेरा आधार कौन है तो वह कहेगी की समीपस्थ मोटी डाली से फिर उस मोटी डाली से पूछा जाय तो वह और मोटी डाली की ओर संकेत करेगी । फिर उस ओर मोटी डाली से उसका आधार पूछा जाय तो पेड़ के तने को कहेगी । अब पेड़ के तने से पूछा जाये तो वह कहेगी । अब पेड़ के तने से पूछा जाय तो वह कहेगा की मेरा आधार स्पष्ट तो नहीं दिखता पर आप देखना चाहें तो मेरे आसपास की धरती को खोद कर देखें तो आप देखेंगे की मेरा आधार पेड़ की जड़ है । अब यदि हम विचार करें की जड़ का आधार क्या है ? तो स्पष्ट अनुभव होगा की पृथ्वी ही जड़ का आधार है । इसी प्रकार हमें अनुभव होगा की पृथ्वी का आधार जल तत्व है । जल तत्व का आधार अग्नि है । अग्नि का आधार वायु है और वायु का आधार जो शक्ति है उसे ही प्राणशक्ति कहना चाहिये जिस से संकल्प उत्तपन्न होते रहते है । और यही सबका आधार है ।
शेष कल .................................................................. 
                                                      तारा महाविद्या ( तारा तंत्र )

तारा महाविद्या ( तारा तंत्र )

शाक्त संप्रदाय में दस महाविद्याओं का विशेष महत्व रहा है . काली ,तारा,भैरवी,छिन्नमस्तिका,षोडशी ,भुवनेश्वरी ,धूमावती ,बगलामुखी ,मातंगी ,कमला  ये महाविद्यायें अपने सभी साधकों के हर मनोरथ पूर्ण करने में सक्षम है


तारा महाविद्या ( तारा तंत्र )



शाक्त संप्रदाय में दस महाविद्याओं का विशेष महत्व रहा है ।
काली,तारा,भैरवी,छिन्नमस्तिका,षोडशी,भुवनेश्वरी ,धूमावती ,बगलामुखी ,मातंगी ,कमला 

ये महाविद्यायें अपने सभी साधकों के हर मनोरथ पूर्ण करने में सक्षम है 
इन दस महाविध्यों में माँ काली के बाद माँ तारा का ही नाम आता है I
माँ तारा सर्वगुणों से से युक्त त्वरित सिद्धि प्रदान करने वाली महाविद्या है I
अपने साधक को भोग ,मोक्ष देकर संसार से तार देती है इसलिए इसको तारणी भी कहते है I 
माँ काली का साम्राज्य मध्य रात्रि से ब्रह्म काल ( महूर्त ) तक है माँ तारा का ब्रह्म महूर्त से सूर्य उदय का है I
माँ तारा को हिरण्यगर्भा विद्या भी माना जाता है I
संपूर्ण जगत का आधार सूर्य है और सौर मंडल आग्नेय है इसलिए वेदों में इसे हिरण्यमय कहते है
अग्नि को हिरण्य-रेता भी कहा जाता है सूर्य अग्नि से पूर्ण है इसलिए उसे हिरण्यमय कहा गया है
आग्नेय मंडल के केंद्र में ब्रह्म तत्व अवस्तिथ है अतः सौर ब्रह्म को हिरण्यगर्भ कहा जाता है I
हिरण्यगर्भ का प्रादुर्भाव सूर्य से है और सौर केंद्र में प्रतिष्ठित हिरण्यगर्भ की महाशक्ति तारा है I
इसलिए तंत्र में सूर्य की शक्ति तारा और तारा के शिव अक्षोभ्य कहा गया है I

प्रत्यालीढ पदार्पिदध्रि शवहृद् घोराट्टहासापरां। खड्गेन्द्रीवर की खर्पर भुजा हूंकार बीजोद्भवा।।
खर्वानील-विशाल-पिंगल-जटाजूटैक नागैर्युता। जाड्यन्यस्य कपालके त्रिजगतां हन्त्युग्रतारा स्वयम्।।

भगवती तारा के इस स्वरूप का चिंतन में बताया गया है कि भगवती तारा की  चारों भुजाओं पर सर्प लिपटे हुए हैं
और यह शव के हृदय पर बाएँ पैर आगे रखकर सवार हैं
और अट्टहास कर रही है एवं हाथों में क्रमशः  खड्ग कमल कैंची तथा नर कपाल लिए है वह नीलग्रीव् है पिंगल केश है
और उनके विशाल नील जटाओं में नाग लिपटे हुए हैं

अब ध्यान की मीमांसा पर विचार करते हैं   माँ तारा प्रलय काल में विष युक्त वायु के द्वारा ही संसार का संहार करती है
प्रलय काल में वायु दूषित होकर विष युक्त हो जाती है इस विषैलेपन का प्रतीक ही  भुजाओं में लिपटे हुए सर्प हैं
मां भगवती की सत्ता विश्व केंद्र में अवस्थित है प्रलय होने के उपरांत जब जगत श्मशान बन जाता है
और  शव रूप हो जाता है तब भगवती तारा इसी शव रूपी केंद्र पर आरूढ होती है रुद्राग्नि अन्न आहुति के आभाव में
उग्र रूप धारण करती है
और भयानक सांय सांय की ध्वनि होने लगती है वही शब्द तारा का अट्टहास है प्रलय काल में पृथ्वी चंद्र तथा
उसमें रहने वाले सभी प्राणियों का रस उग्र सौर ताप के कारण सूख जाता है
और वहां समस्त रस भगवती उग्रतारा पान करती है समस्त प्राणियों का रस मुख्यतः सर में रहता है
जिसे कपाल कहा जाता है और उसका वर्ण पिंगल है इसलिए भगवती तारा को नीलवर्ण तथा जटाओं को पिंगलवर्ण
कहा गया है भीषण प्रलय काल में जहरीली गैसों का प्रभाव अधिक होता है
इसलिए जटाजूट को नाग रूप में दर्शाया है कमल और कैंची तथा खडग  क्रमशः
चंद्र और पृथ्वी के मध्य रहने वाले प्राणियों के अन्न आदि की सुरक्षा समृद्धता तथा उस समृद्धता \को नष्ट करने वालों
को नष्ट करने के लिए कैंची का संकेत रखा गया है
इस प्रकार विश्व प्रलय तथा विश्व प्रलय से सुरक्षा प्रदान करने वाली भगवती तारा
अपने भक्तों की बुद्धिगत जड़ता का नाश करते हुये धर्म , अर्थ ,काम और मोक्ष प्रदान करती है ।
अंत समय मे अपने मे समाहित कर ले ऐसी कामना की गई है । 
माँ तारा की साधना से साधक को समस्त ब्रह्मांड का ज्ञान और उसका रहस्य प्राप्त होता है । 

माँ तारा के मुख्य तीन रूपों का उल्लेख मिलता है । 

1 - नीलसरस्वती 
2 - एकजटा
3 - उग्र तारा 

बौद्ध तंत्र मे तारा और कई भेद है उस मे से कुछ भेद रूपों का उल्लेख जहां मे कर रहा हूँ । 

  1. स्पर्श तारा 
  2. चिंतामणि तारा 
  3. सिद्धि जटा 
  4. उग्र जटा 
  5. हंस तारा 
  6. निर्वाणकला 
  7. महानीला
  8. नीलशंभव तारा 

माँ तारा की साधना मे कुछ देवी देवताओं की साधना करना अनिवार्य है । 
माँ तारा के शिव अक्षोभ्य है 
गणेश उच्छिष्ट गणेश 
योगनि और बटुक भैरव का पूजन भी साथ किया जाता है । 
माँ तारा के शिव और गणेश की साधना के बिना सफलता प्राप्त नहीं होती 

आज लेख माँ तारा पर यही तक है । अगले लेख मे माँ तारा की साधना पर चर्चा करेंगे । 
जैसे माँ तारा की साधना चिनाचार से की जाती है । 

चीनाचार क्या है ?
दक्षिणाचार और वामाचार क्या ?
भाव क्या है ? 
प्रात: कृत्य क्या है ?

ये सब जाने के लिए अगली पोस्ट अवश्य पढ़ें 

तारा महाविध्या ( तारा तंत्र भाग -2 )


अथ श्री तारा पच्चीसी

अथ श्री तारा पच्चीसी



आज बुद्ध पुर्णिमा हैं । गौतम बुद्ध उच्च कोटी के साधक थे । ये उन साधकों में आते हैं जो ईश्वर का अवतार कहलतें हैं । जो समाज को दिशा नहीं दिखते बल्कि हाथ पकड़ कर उनको मोक्ष और ज्ञान की प्राप्ति करवाते हैं । बुद्ध माँ तारा के उच्च कोटी के साधक थे । आज का दिन माँ तारा का भी हैं । इसलिए मैं " श्री तारा पच्चीसी"  प्रस्तुत कर रहा हूँ जो एक कल्याण कारी पाठ हैं । 






नमो - नमो जय तारिणी माता , विश्व जननि मंगल मुद गाता ।
आदि शक्ति अनन्त जग माता , निज इच्छा से खेल रचाया ॥
हूंकार है बीज तुम्हारा , जिससे फैल रहा उजियारा ।
सूर्य चन्द्र में जोत तुम्हारी , सकल काम्ना पूरणकारी ॥
अष्ठ पाश को काटनहारी ,तारक भाव सदा सुखकारी ।
महानील विकराल विशाला , लपटे अंग भुजंग कराला ॥
पाँच प्रेत मस्तक पर राजे , शिखा मूल अक्षोभ्य विराजे  ।
चार हाथ मुद मंगलकारी , शत्रु दलन दुख भंजनहारी ॥
नरक कपाल माला गल सोहे , रूप निरख जग मोहित होवे ।
भगाकार भाग रूप भवानी , जयति जयति तारा महारानी ॥
जटा जूट माथे पर राजे , शव पर देवी स्वयें विराजे ।
बुद्ध तथागत जो अधिकारी , तिन पर तव महिमा अति भारी ॥







वृजनील सुंदर तुम बाला , हो हूं भक्त पर परम कृपाला ।
राम रूप धरि रावण मारा , कृष्ण रूप धरि कंस पछारा ॥
दो भुज चार चतुर्भुज रूपा , तारा रूप स्वरूप अनुपा ।
चिंतामणि सिद्धि संसारा , मातु तुम्हीं जग पारावारा ॥
अखिल एक ब्रह्मांड निकाया , करहू सदा भक्तन पर दाया ।
प्रलय काल में जब महारानी , फैला जल चहूँ और भवानी ॥
नीलाजल सब और सुहावन , ब्रहमदिक सब कर स्तवन  ।
तारा – तारा जय जय तारा , देव रटें सब नाम तुम्हारा ॥
तब कृपाल भई मातु भवानी , सष्टि करण की इच्छा ठानी ।
रूप अनेक मातु तब धारे , देव सहित सब मनुज संवारे ॥
चार वर्ण सृष्टि उपजाई , वेदन तब महिमा अतिगाई ।
तारा मंत्र जपे जो कोई , कबहुँ ताय विपदा नहीं होई ॥
शनैः शनैः तारा पद पाई , जग सुख भोग परम पद जाई

॥ जय तारिणी माता ॥
प्रश्न और उत्तर

प्रश्न और उत्तर









जय तारणी माँ _/\_ ....... बहुत समय से लोगो द्वारा कुछ प्रश्न पूछे जा रहे हैं ये वो प्रश्न हैं जीना उत्तर जानना लगभग हर व्यक्ति चाहता हैं .... सब के अनुभव अलग अलग होते हैं । इसलिए उत्तर का रूप भी प्रथक होता है पर सब उत्तरों का मूल एक ही होता हैं प्रथकता केवल शब्दों में होती हैं । मैं इन  प्रश्नो का और उनका उत्तर आप सब के साथ रखना चाहता हूँ ... जिस से मेरे और आप सब के उत्तर मिलकर उन लोगो की जिज्ञासा शांत कर सकें । 



प्रश्न :- 1 - अध्यात्म क्या हैं ?


उत्तर :-  प्रत्येक प्राणी के स्वभाव को अध्यात्म कहते हैं । प्रत्येक जीव के मस्तिष्क में जो विचार उठते है उन्हीं विचारों से उसके प्रत्येक कार्य होते हैं । साधक के लिए उसके प्रातः से लेकर संध्या तक सभी कार्य ही अध्यात्म हैं । क्योंकि वह पूर्ण रूप से शक्ति के समर्पित है । साधक द्वारा जो भी कार्य हो रहे हैं सब भगवती के ही कार्य हो रहे हैं । वह तो केवल निमित्त मात्र है ऐसी विचारधारा उसके मस्तिष्क में नित्य ही बढ़ती रहेगी । जिससे उसके द्वारा किये गये सभी कार्य ही उत्तमता से होंगे और उसका मस्तिष्क भी संतुलित रहेगा । इस प्रकार समस्त कार्य ही आध्यात्मिक हाए जायेंगे । व्यक्ति हो आध्यात्मिक कहेंगे ।



प्रश्न :- 2 - देवता की परिभाषा क्या हैं ?


उत्तर :- 2 -  वास्तविक देवता तो प्रत्येक इंद्रिय की शक्ति का नाम है । किन्तु आध्यात्मिक भाव से अपने यहाँ पर जगह जगह मंदिर बनाये गये है । उन्हें देखकर हमें इस बात की याद आती रहे की प्रत्येक काम प्रभुसत्ता का हो रहा हैं । इसी उद्देश से घर में लोग भगवान की तस्वीरें रख लेते है की घर के हर एक कार्य करने में यह ध्यान रहे की " मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ प्रत्येक कार्य प्रभु सत्ता से हो रहा हैं ।


प्रश्न :- 3 -  ज्ञान , भक्ति , कर्म का वास्तविक संबंध क्या है  ? 


उत्तर :- 3 - ज्ञान कहते हैं जानकारी को ,  भक्ति कहते है प्रेमभाव को और कार्य करने को कर्म कहते है । बिना किसी जानकारी के किसी में भक्ति भाव आना असंभव है  और बिना प्रेमभाव  के उनके द्वारा बताये हुये कार्य ठीक से नहीं हो सकते । इसलिये ज्ञान , भक्ति व कर्म के संबंध आपस में जुड़ें हुये है । या यों कहिये की ज्ञान , भक्ति  व कर्म तीनों अलग अलग नहीं एक ही है । 


प्रश्न :- 4    क्या आत्मा परमात्मा में मिल सकती है  ?


उत्तर :- 4 -  परमात्म - सत्ता सब जगह  व्याप्त है और वह अविभाजित है । इसलिये आत्मा को परमात्म में मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता जैसे सात घड़े एक साथ रखें हों तो सूर्य का प्रतिबिम्ब उनसभी में दिखाई देगा और उनमें से एक घड़े को फोड़ दो तो सूर्य का प्रतिबिम्ब उस घड़े से लुप्त हो जायेगा , यदपि सूर्य सर्वत्र ही व्याप्त है । इस प्रकार जिस घड़े को भी तोड़ोगे उसी में सूर्य का प्रतिबिम्ब नहीं देखेगा जबकि सूर्य अपनी जगह स्थित है उसमें हेरफेर नहीं । ऐसे ही आत्मा सब जगह व्याप्त है उस में हेरफेर नहीं । 


प्रश्न :- 5 - साधक , साधना देने का अधिकारी कब होता हैं ?


उत्तर :- 5 - साधक , साधना देने का अधिकारी तब होता हैं जब उसे साधना में पैर के अँगूठे से लेकर सिर की चोटी तक शक्ति का संवेदन अनुभव हो और फिर वैसे ही सिर से लेकर पैर तक वापिस जाना अनुभव हो । वेग के समय एक हाथ दूसरे हाथ को यदि स्पर्श करें तो दूसरे हाथ में स्पंदन होने लगे । इस प्रकार की क्रियाएँ साधक को जब होने लगेंगी तब उसे अन्दर से अपने आप इस प्रकार की इच्छा उत्पन्न होगी की अब तुम साधना में श्रद्धालु भक्तों को बैठा सकते हो